Drishti current affairs
हाइड्रोजन उत्पादन के लिये क्षारीय समुद्री जल इलेक्ट्रोलाइज़र
हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी केंद्र (IIT) मद्रास के शोधकर्त्ताओं ने मौजूदा जल इलेक्ट्रोलाइज़र प्रौद्योगिकी से संबंधित चुनौतियों का समाधान करते हुए हाइड्रोजन उत्पन्न करने के लिये क्षारीय समुद्री जल इलेक्ट्रोलाइज़र विकसित किया है।
- क्षारीय जल इलेक्ट्रोलाइज़र (Alkaline Water Electrolyzer)एक ऊर्जा-गहन तकनीक है, इसके लिये एक महँगे ऑक्साइड-बहुलक विभाजक की आवश्यकता होती है और इसमें इलेक्ट्रोलिसिस हेतु ताज़े जल का उपयोग किया जाता है। सरल, स्केलेबल एवं लागत प्रभावी विकल्पों को विकसित करके इस आविष्कार ने संबद्ध प्रत्येक चुनौती का समाधान कर दिया है तथा यह हाइड्रोजन उत्पन्न करने में अत्यधिक कुशल है।
प्रमुख बिंदु
- कार्बन आधारित सहायक उत्प्रेरक:
- क्षारीय जल इलेक्ट्रोलाइज़र मेंएनोड और कैथोड पर दो अभिक्रियाएँ होती हैं। कैथोड पर जल H+ एवं हाइड्रॉक्साइड आयनों में विभाजित हो जाता है। H+ आयन हाइड्रोजन बन जाते हैं, जबकि हाइड्रॉक्साइड आयन विभाजक से गुज़रते हैं तथा एनोड पर ऑक्सीजन बनाते हैं।
- हालाँकि जब समुद्री जल का उपयोग किया जाता है, तो चुनौतियाँ होती हैं। एनोड हाइपोक्लोराइट बनाता है, जोइलेक्ट्रोड सहायक पदार्थ को खराब करता है और ऑक्सीजन उत्पादन के साथ प्रतिस्पर्द्धा करता है। कैथोड में अशुद्धियाँ होती हैं जो हाइड्रोजन उत्पादन को धीमा कर देती हैं।
- इन चुनौतियों का समाधान करने हेतुइलेक्ट्रोड में उत्प्रेरक के साथ लेपित एक विशेष सहायक सामग्री होती है। समुद्री जल को संक्षारित करने वाली धातुओं का उपयोग करने के बजाय कार्बन आधारित सामग्री का उपयोग किया जाता है।
- एनोड और कैथोड दोनों में पाई जाने वालायह सहायक पदार्थ उत्प्रेरक के साथ लेपित होता है। उत्प्रेरक एक साथ हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन के बेहतर उत्पादन को सक्षम बनाता है।
- सेल्यूलोज़ आधारित विभाजक:
- आमतौर पर क्षारीय इलेक्ट्रोलिसिस में एनोड और कैथोड को अलग करने के लिये एक महँगीज़िरकोनियम ऑक्साइड-आधारित सामग्री का उपयोग किया जाता है।
- हालाँकि शोधकर्त्ताओं नेसेल्यूलोज़-आधारित विभाजक का उपयोग किया है। यह विभाजक हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के क्रॉसओवर को कम करते हुए हाइड्रॉक्साइड आयनों को कैथोड से एनोड तक जाने की अनुमति देता है।
- समुद्री जल केसंपर्क में आने पर यह विभाजक गिरावट हेतु अत्यधिक प्रतिरोधी है। दीर्घकालिक प्रदर्शन और स्थायित्व के लिये यह एक महत्त्वपूर्ण गुण है।
इस आविष्कार का महत्त्व:
- यहआविष्कार वर्तमान तकनीकों की सीमाओं को संबोधित करता है और स्केलेबल तथा टिकाऊ हाइड्रोजन उत्पादन का मार्ग प्रशस्त करता है, जो एक हरित एवं अधिक टिकाऊ भविष्य में योगदान देता है।
हरित हाइड्रोजन के विकास के पीछे प्रमुख कारण:
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना:
- ग्रीन हाइड्रोजन विकसित करने का प्राथमिक कारण है ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और जलवायु परिवर्तन का शमन करना। परिवहन एवं विद्युत उत्पादन के लिये जीवाश्म ईंधन का उपयोग वैश्विक उत्सर्जन का एक प्रमुख योगदानकर्त्ता है।
- नवीकरणीय स्रोतों से उत्पादित हरित हाइड्रोजन ग्रीनहाउस गैसों का शून्य उत्सर्जन करता है, जो इसे एक सतत्/संवहनीय और पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा स्रोत बनाता है।
- ऊर्जा सुरक्षा और स्वतंत्रता:
- जीवाश्म ईंधन सीमित संसाधन हैं और वैश्विक आपूर्ति एवं मांग के आधार पर उनकी कीमतों में उतार-चढ़ाव होता रहता है। हरित हाइड्रोजन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को विकसित करकेदुनिया के देश अधिक ऊर्जा-स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर बन सकते हैं तथा मूल्य में उतार-चढ़ाव संबंधी झटकों एवं आपूर्ति बाधाओं के प्रति कम संवेदनशील बन सकते हैं।
- ऐसे क्षेत्र में डीकार्बोनाइज़ेशन जहाँ यह मुश्किल हो:
- जीवाश्म ईंधन को हरित हाइड्रोजन से प्रतिस्थापित करने की व्यापक संभावना मौजूद है,विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जिन्हें डीकार्बोनाइज़ करना कठिन है (जैसे कि भारी उद्योग और विमानन क्षेत्र)। ये क्षेत्र वैश्विक उत्सर्जन में उल्लेखनीय योगदान देते हैं और हरित हाइड्रोजन का उपयोग उनके ‘कार्बन फुटप्रिंट’ को कम करने में मदद कर सकता है।
- प्रौद्योगिकी प्रगति:
- हरित हाइड्रोजन प्रौद्योगिकी उन्नतिविभिन्न क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देती है। हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण और वितरण के लिये बुनियादी ढाँचा विकसित करने के लिये नई तकनीकों, सामग्रियों एवं प्रणालियों की आवश्यकता है। यह संबंधित उद्योगों में प्रगति तथा सफलताओं को प्रोत्साहित करती है।
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